Thursday, July 14, 2022

प्रबंध काव्य | पद्मावत ( सिंहलद्वीप -वर्णन खण्ड ) | मलिक मोहम्मद जायसी | Prabandh Kavya | Padmavat/ Singhaldweep Varnan Khand | Malik Muhammad Jayasi



 सिंघलदीप कथा अब गावौं । औ सो पदमिनी बरनि सुनावौं ॥

निरमल दरपन भाँति बिसेखा । जौ जेहि रूप सो तैसई देखा ॥

धनि सो दीप जहँ दीपक-बारी । औ पदमिनि जो दई सँवारी ॥

सात दीप बरनै सब लोगू । एकौ दीप न ओहि सरि जोगू ॥

दियादीप नहिं तस उँजियारा । सरनदीप सर होइ न पारा ॥

जंबूदीप कहौं तस नाहीं । लंकदीप सरि पूज न छाहीं ॥

दीप गभस्थल आरन परा । दीप महुस्थल मानुस-हरा ॥


सब संसार परथमैं आए सातौं दीप ।

एक दीप नहिं उत्तिम सिंघलदीप समीप ॥1॥


ग्रंध्रबसेन सुगंध नरेसू । सो राजा, वह ताकर देसू ॥

लंका सुना जो रावन राजू । तेहु चाहि बड ताकर साजू ॥

छप्पन कोटि कटक दल साजा । सबै छत्रपति औ गढ -राजा ॥

सोरह सहस घोड घोडसारा । स्यामकरन अरु बाँक तुखारा ॥

सात सहस हस्ती सिंघली । जनु कबिलास एरावत बली ॥

अस्वपतिक-सिरमोर कहावै । गजपतीक आँकुस-गज नावै ॥

नरपतीक कहँ और नरिंदू ?। भूपतीक जग दूसर इंदू ॥


ऐस चक्कवै राजा चहूँ खंड भय होइ ।

सबै आइ सिर नावहिं सरबरि करै न कोइ ॥2॥


जबहि दीप नियरावा जाई । जनु कबिलास नियर भा आई ॥

घन अमराउ लाग चहुँ पासा । उठा भूमि हुत लागि अकासा ॥

तरिवर सबै मलयगिरि लाई । भइ जग छाँह रैनि होइ आई ॥

मलय-समीर सोहावन छाहाँ । जेठ जाड लागै तेहि माहाँ ॥

ओही छाँह रैनि होइ आवै । हरियर सबै अकास देखावै ॥

पथिक जो पहुँचै सहि कै घामू । दुख बिसरै, सुख होइ बिसरामू ॥

जेइ वह पाई छाँह अनूपा । फिरि नहिं आइ सहै यह धूपा ॥


अस अमराउ सघन घन, बरनि न पारौं अंत ।

फूलै फरै छवौ ऋतु , जानहु सदा बसंत ॥3॥


फरै आँब अति सघन सोहाए । औ जस फरे अधिक सिर नाए ॥

कटहर डार पींड सन पाके । बडहर, सो अनूप अति ताके ॥

खिरनी पाकि खाँड अस मीठी । जामुन पाकि भँवर अति डीठी ॥

नरियर फरे फरी फरहरी । फुरै जानु इंद्रासन पुरी ॥

पुनि महुआ चुअ अधिक मिठासू । मधु जस मीठ, पुहुप जस बासू ॥

और खजहजा अनबन नाऊँ । देखा सब राउन-अमराऊ ॥

लाग सबै जस अमृत साखा । रहै लोभाइ सोइ जो चाखा ॥


लवग सुपारी जायफल सब फर फरे अपूर ।

आसपास घन इमिली औ घन तार खजूर ॥4॥


बसहिं पंखि बोलहिं बहु भाखा । करहिं हुलास देखि कै साखा ॥

भोर होत बोलहिं चुहुचूही । बोलहिं पाँडुक "एकै तूही"" ॥

सारौं सुआ जो रहचह करही । कुरहिं परेवा औ करबरहीं ॥

"पीव पीव"कर लाग पपीहा । "तुही तुही" कर गडुरी जीहा ॥

`कुहू कुहू' करि कोइल राखा । औ भिंगराज बोल बहु भाखा ॥

`दही दही' करि महरि पुकारा । हारिल बिनवै आपन हारा ॥

कुहुकहिं मोर सोहावन लागा । होइ कुराहर बोलहि कागा ॥


जावत पंखी जगत के भरि बैठे अमराउँ ।

आपनि आपनि भाषा लेहिं दई कर नाउँ ॥5॥


पैग पैग पर कुआँ बावरी । साजी बैठक और पाँवरी ॥

और कुंड बहु ठावहिं ठाऊँ। औ सब तीरथ तिन्ह के नाऊँ ॥

मठ मंडप चहुँ पास सँवारे । तपा जपा सब आसन मारे ॥

कोइ सु ऋषीसुर, कोइ सन्यासी । कोई रामजती बिसवासी ॥

कोई ब्रह्मचार पथ लागे । कोइ सो दिगंबर बिचरहिं नाँगे ॥

कोई सु महेसुर जंगम जती । कोइ एक परखै देबी सती ॥

कोई सुरसती कोई जोगी । निरास पथ बैठ बियोगी ॥


सेवरा, खेवरा, बानपर, सिध, साधक, अवधूत ।

आसन मारे बैट सब जारि आतमा भूत ॥6॥


मानसरोदक बरनौं काहा । भरा समुद अस अति अवगाहा ॥

पानि मोती अस निरमल तासू । अमृत आनि कपूर सुबासू ॥

लंकदीप कै सिला अनाई । बाँधा सरवर घाट बनाई ॥

खँड खँड सीढी भईं गरेरी । उतरहिं चढहिं लोग चहुँ फेरी ॥

फूला कँवल रहा होइ राता । सहस सहस पखुरिन कर छाता ॥

उलथहिं सीफ , मोति उतराहीं । चुगहिं हंस औ केलि कराहीं ॥

खनि पतार पानी तहँ काढा । छीरसमुद निकसा हुत बाढा ॥


ऊपर पाल चहूँ दिसि अमृत-फल सब रूख ।

देखि रूप सरवर कै गै पियास औ भूख ॥7॥


पानि भरै आवहिं पनिहारी । रूप सुरूप पदमिनी नारी ॥

पदुमगंध तिन्ह अंग बसाहीं । भँवर लागि तिन्ह सँग फिराहीं ॥

लंक-सिंघिनी, सारँगनैनी । हंसगामिनी कोकिलबैनी ॥

आवहिं झुंड सो पाँतिहिं पाँती । गवन सोहाइ सु भाँतिहिं भाँती ॥

कनक कलस मुखचंद दिपाहीं । रहस केलि सन आवहिं जाहीं ॥

जा सहुँ वै हेरैं चख नारी ।बाँक नैन जनु हनहिं कटारी ॥

केस मेघावर सिर ता पाईं । चमकहिं दसन बीजु कै नाईं ॥


माथे कनक गागरी आवहिं रूप अनूप ।

जेहि के अस पनहारी सो रानी केहि रूप ॥8॥


ताल तलाव बरनि नहिं जाहीं । सूझै वार पार किछु नाहीं ॥

फूले कुमुद सेत उजियारे । मानहुँ उए गगन महँ तारे ॥

उतरहिं मेघ चढहि लेइ पानी चमकहिं मच्छ बीजु कै बानी ॥

पौंरहि पंख सुसंगहिं संगा । सेत पीत राते बहु रंगा ॥

चकई चकवा केलि कराहीं । निसि के बिछोह, दिनहिं मिलि जाहीं ॥

कुररहिं सारस करहिं हुलासा । जीवन मरन सो एकहिं पासा ॥

बोलहिं सोन ढेक बगलेदी । रही अबोल मीन जल-भेदी ॥


नग अमोल तेहि तालहिं दिनहिं बरहिं जस दीप ।

जो मरजिया होइ तहँ सो पावै वह सीप ॥9॥


आस-पास बहु अमृत बारी । फरीं अपूर होइ रखवारी ॥

नारग नीबू सुरँग जंभीरा । औ बदाम बहु भेद अँजीरा ॥

गलगल तुरज सदाफर फरे । नारँग अति राते रस भरे ॥

किसमिस सेव फरे नौ पाता । दारिउँ दाख देखि मन राता ॥

लागि सुहाई हरफारयोरी । उनै रही केरा कै घौरी ॥

फरे तूत कमरख औ न्योजी । रायकरौंदा बेर चिरौंजी ॥

संगतरा व छुहारा दीठे । और खजहजा खाटे मीठे ॥


पानि देहिं खँडवानी कुवहिं खाँड बहु मेलि ।

लागी घरी ग्हट कै सीचहिं अमृतबेल ॥10॥


पुनि फुलवारि लागि चहुँ पासा । बिरिछ बेधि चंदन भइ बासा ॥

बहुत फूल फूलीं घनबेली । केवडा चंपा कुंद चमेली ॥

सुरँग गुलाल कदम और कूजा । सुगँध बकौरी गंध्रब पूजा ॥

जाही जूही बगुचन लावा । पुहुप सुदरसन लाग सुहावा ॥

नागेसर सदबरग नेवारी । औ सिंगारहार फुलवारी ॥

सोनजरद फूलीं सेवती । रूपमंजरी और मालती ॥

मौलसिरी बेइलि औ करना । सबै फूल फूले बहुबरना ॥


तेहिं सिर फूल चढहिं वै जेहि माथे मनि-भाग ।

आछहिं सदा सुगंध बहु जनु बसंत औ फाग ॥11॥


सिंगलनगर देखु पुनि बसा । धनि राजा अस जे कै दसा ॥

ऊँची पौरी ऊँच अवासा । जनु कैलास इंद्र कर वासा ॥

राव रंक सब घर घर सुखी । जो दीखै सौ हँसता-मुखी ॥

रचि रचि साजे चंदन चौरा । पोतें अगर मेद औ गौरा ॥

सब चौपारहि चंदन खभा । ओंठँघि सभासद बैठे सभा ॥

मनहुँ सभा देवतन्ह कर जुरी । परी दीठि इंद्रासन पुरी ॥

सबै गुनी औ पंडित ज्ञाता । संसकिरित सबके मुख बाता ॥


अस कै मंदिर सँवारे जनु सिवलोक अनूप ।

घर घर नारि पदमिनी मोहहिं दरसन-रूप ॥12॥


पुनि देखी सिंघल फै हाटा । नवो निद्धि लछिमी सब बाटा ॥

कनक हाट सब कुहकुहँ लीपी । बैठ महाजन सिंघलदीपी ॥

रचहिं हथौडा रूपन ढारी । चित्र कटाव अनेक सवारी ॥

सोन रूप भल भयऊ पसारा । धवल सिरीं पोतहिं घर बारा ॥

रतन पदारथ मानिक मोती । हीरा लाल सो अनबन जोती ॥

औ कपूर बेना कस्तूरी । चंदन अगर रहा भरपूरी ॥

जिन्ह एहि हाट न लीन्ह बेसाहा । ता कहँ आन हाट कित लाहा ?॥


कोई करै बेसाहिनी, काहू केर बिकाइ ।

कोई चलै लाभ सन, कोई मूर गवाइ ॥13॥


पुनि सिंगारहाट भल देसा । किए सिंगार बैठीं तहँ बेसा ॥

मुख तमोल तन चीर कुसुंभी । कानन कनक जडाऊ खुंभी ॥

हाथ बीन सुनि मिरिग भुलाहीं । नर मोहहिं सुनि, पैग न जाहीं ॥

भौंह धनुष, तिन्ह नैन अहेरी । मारहिं बान सान सौं फेरी ॥

अलक कपोल डोल हँसि देहीं । लाइ कटाछ मारि जिउ लेहीं ॥

कुच कंचुक जानौ जुग सारी । अंचल देहिं सुभावहिं ढारी ॥

केत खिलार हारि तेहि पासा । हाथ झारि उठि चलहिं निरासा ॥


चेटक लाइ हरहिं मन जब लहि होइ गथ फेंट ।

साँठ नाठि उटि भए बटाऊ, ना पहिचान न भेंट ॥14॥


लेइ के फूल बैठि फुलहारी । पान अपूरब धरे सँवारी ॥

सोंधा सबै बैठ ले गाँधी । फूल कपूर खिरौरी बाँधी ॥

कतहूँ पंडित पढँहिं पुरानू । धरमपंथ कर करहिं बखानू ॥

कतहूँ कथा कहै किछु कोई । कतहूँ नाच-कूद भल होई ॥

कतहुँ चिरहँटा पंखी लावा । कतहूँ पखंडी काठ नचावा ॥

कतहूँ नाद सबद होइ भला । कतहूँ नाटक चेटक-कला ॥

कतहुँ काहु ठगविद्या लाई । कतहुँ लेहिं मानुष बौराई ॥


चरपट चोर गँठिछोरा मिले रहहिं ओहि नाच ।

जो ओहि हाट सजग भा गथ ताकर पै बाँच ॥15॥


पुनि आए सिंघल गढ पासा । का बरनौं जनु लाग अकासा ॥

तरहिं करिन्ह बासुकि कै पीठी । ऊपर इंद्र लोक पर दीठी ॥

परा खोह चहुँ दिसि अस बाँका । काँपै जाँघ, जाइ नहिं झाँका ॥

अगम असूझ देखि डर खाई । परै सो सपत-पतारहिं जाई ॥

नव पौरी बाँकी, नवखंडा । नवौ जो चढे जाइ बरम्हंडा ॥

कंचन कोट जरे नग सीसा । नखतहिं भरी बीजु जनु दीसा ॥

लंका चाहि ऊँच गढ ताका । निरखि न जाइ, दीठि तन थाका ॥


हिय न समाइ दीठि नहिं जानहुँ ठाढ सुमेर ।

कहँ लगि कहौं ऊँचाई, कहँ लगि बरनौं फेर ॥16॥


निति गढ बाँचि चलै ससि सूरू । नाहिं त होइ बाजि रथ चूरू ॥

पौरी नवौ बज्र कै साजी । सहस सहस तहँ बैठे पाजी ॥

फिरहिं पाँच कोतवार सुभौंरी । काँपै पावैं चपत वह पौरी ॥

पौरहि पौरि सिंह गढि काढे । डरपहिं लोग देखि तहँ ठाढे ॥

बहुबिधान वै नाहर गढे । जनु गाजहिं, चाहहिं सिर चढे ॥

टारहिं पूँछ, पसारहिं जीहा । कुंजर डरहिं कि गुंजरि लीहा ॥

कनक सिला गढि सीढी लाई । जगमगाहि गढ ऊपर ताइ ॥


नवौं खंड नव पौरी , औ तहँ बज्र-केवार ।

चारि बसेरे सौं चढै, सत सौं उतरे पार ॥17॥


नव पौरी पर दसवँ दुवारा । तेहि पर बाज राज-घरियारा ॥

घरी सो बैठि गनै घरियारी । पहर सो आपनि बारी ॥

जबहीं घरी पूजि तेइँ मारा । घरी घरी घरियार पुकारा ॥

परा जो डाँड जगत सब डाँडा । का निचिंत माटी कर भाँडा ?॥

तुम्ह तेहि चाक चढे हौ काँचे । आएहु रहै न थिर होइ बाँचे ॥

घरी जो भरी घटी तुम्ह आऊ । का निचिंत होइ सोउ बटाऊ ?॥

पहरहिं पहर गजर निति होई । हिया बजर, मन जाग न सोई ॥


मुहमद जीवन-जल भरन, रहँट-घरी कै रीति ।

घरी जो आई ज्यों भरी , ढरी,जनम गा बीति ॥18॥


गढ पर नीर खीर दुइ नदी । पनिहारी जैसे दुरपदी ॥

और कुंड एक मोतीचूरू । पानी अमृत, कीच कपूरु ॥

ओहि क पानि राजा पै पीया । बिरिध होइ नहिं जौ लहि जीया ॥

कंचन-बिरछि एक तेहि पासा । जस कलपतरु इंद्र-कविलासा ॥

मूल पतार, सरग ओहि साखा । अमरबेलि को पाव, को चाखा ?॥

चाँद पात औ फूल तराईं । होइ उजियार नगर जहँ ताई ॥

वह फल पावै तप करि कोई । बिरधि खाइ तौ जोबन होई ॥


राजा भए भिखारी सुनि वह अमृत भोग ।

जेइ पावा सो अमर भा, ना किछु व्याधि न रोग ॥19॥


गढ पर बसहिं झारि गढपती । असुपति, गजपति, भू-नर-पती ॥

सब धौराहर सोने साजा । अपने अपने घर सब राजा ॥

रूपवंत धनवंत सभागे । परस पखान पौरि तिन्ह लागे ॥

भोग-विलास सदा सब माना । दुख चिंता कोइ जनम न जाना ॥

मँदिर मँदिर सब के चौपारी । बैठि कुँवर सब खेलहिं सारी ॥

पासा ढरहिं खेल भल होई । खडगदान सरि पूज न कोई ॥

भाँट बरनि कहि कीरति भली । पावहिं हस्ति घोड सिंघली ॥


मँदिर मँदिर फुलवारी, चोवा चंदन बास ।

निसि दिन रहै बसंत तहँ छवौ ऋतु बारह मास ॥20॥


पुनि चलि देखा राज-दुआरा । मानुष फिरहिं पाइ नहिं बारा ॥

हस्ति सिंघली बाँधे बारा । जनु सजीव सब ठाढ पहारा ॥

कौनौ सेत, पीत रतनारे । कौनौं हरे, धूम औ कारे ॥

बरनहिं बरन गगन जस मेघा । औ तिन्ह गगन पीठी जनु ठेघा ॥

सिंघल के बरनौं सिंघली । एक एक चाहि एक एक बली ॥

गिरि पहार वै पैगहि पेलहिं । बिरिछ उचारि डारि मुख मेलहिं ॥

माते तेइ सब गरजहिं बाँधे । निसि दिन रहहिं महाउत काँधे ॥


धरती भार न अगवै, पाँव धरत उठ हालि ।

कुरुम टुटै, भुइँ फाटै तिन हस्तिन के चालि ॥21॥


पुनि बाँधे रजबार तुरंगा । का बरनौं जस उन्हकै रंगा ॥

लील, समंद चाल जग जाने । हाँसुल, भौंर, गियाह बखाने ॥

हरे, कुरंग, महुअ बहु भाँती । गरर, कोकाह, बुलाह सु पाँती ॥

तीख तुखार चाँड औ बाँके । सँचरहिं पौरि ताज बिनु हाँके ॥

मन तें अगमन डोलहिं बागा । लेत उसास गगन सिर लागा ॥

पौन-समान समुद पर धावहिं । बूड न पाँव, पार होइ आवहिं ॥

थिर न रहहिं, रिस लोह चबाहीं । भाँजहिं पूँछ, सीस उपराहीं ॥


अस तुखार सब देखे जनु मन के रथवाह ।

नैन-पलक पहुँचावहिं जहँ पहुँचा कोइ चाह ॥22॥


राजसभा पुनि देख बईठी । इंद्रसभा जनु परि गै डीठी ॥

धनि राजा असि सभा सँवारी । जानहु फूलि रही फुलवारी ॥

मुकुट बाँधि सब बैठे राजा । दर निसान नित जिन्हके बाजा ॥

रूपवंत, मनि दिपै लिलाटा । माथे छात, बैठ सब पाटा ॥

मानहुँ कँवल सरोवर फूले । सभा क रूप देखि मन भूले ॥

पान कपूर मेद कस्तूरी । सुगँध बास भरि रही अपूरी ॥

माँझ ऊँच इंद्रासन साजा । गंध्रबसेन बैठ तहँ राजा ॥


छत्र गगन लगि ताकर, सूर तवै जस आप ।

सभा कँवल अस बिगसै, माथे बड परताप ॥23॥


साजा राजमंदिर कैलासू । सोने कर सब धरति अकासू ॥

सात खंड धौराहर साजा । उहै सँवारि सकै अस राजा ॥

हीरा ईंट, कपूर गिलावा । औ नग लाइ सरग लै लावा ॥

जावत सबै उरेह उरेहे । भाँति भाँति नग लाग उबेहे ॥

भाव कटाव सब अनबत भाँती । चित्र कोरि कै पाँतिहिं पाँती ॥

लाग खंभ-मनि-मानिक जरे । निसि दिन रहहिं दीप जनु बरे ॥

देखि धौरहर कर उँजियारा । छपि गए चाँद सुरुज औ तारा ॥


सुना सात बैकुंठ जस तस साजे खँड सात ।

बेहर बेहर भाव तस खंड खंड उपरात ॥24॥


वरनों राजमंदिर रनिवासू । जनु अछरीन्ह भरा कविलासू ॥

सोरह सहस पदमिनी रानी । एक एक तें रूप बखानी ॥

अतिसुरूप औ अति सुकुवाँरी । पान फूल के रहहिं अधारी ॥

तिन्ह ऊपर चंपावति रानी । महा सुरूप पाट-परधानी ॥

पाट बैठि रह किए सिंगारू । सब रानी ओहि करहिं जोहारू ॥

निति नौरंग सुरंगम सोई । प्रथम बैस नहिं सरवरि कोई ॥

सकल दीप महँ जेती रानी । तिन्ह महँ दीपक बारह-बानी ॥


कुँवर बतीसो-लच्छनी अस सब माँ अनूप ।

जावत सिंघलदीप के सबै बखानैं रूप ॥25॥


(1) बारी = बाला, स्त्री । सरनदीप-अरबवाले लंका को सरनदीप कहते थे । भूगोलल का ठीक ज्ञान न होने के कारण कवि ने स्वर्णदीप और सिंहल को भिन्न भिन्न द्वीप माना है । हरा = शून्य

(2) तुखार =तुषार देश का घोडा । इंदू =इंद्र । चाहि = अपेक्षा (बढकर) बनिस्बत। कविलास = स्वर्ग ।

(3) भूमि हुत = पृथ्वी से (लेकर) लागि = तक ।

(4) पींड = जड के पास की पेडी । फुरै = सचमुच । खजहजा = खाने के फल । अनबन =भिन्न भिन्न

(5) चुहचूही =एक छोटी चिडिया जिसे फूल सुँघनी भी कहते हैं । सारौं = सारिका, मैना । महरि = महोख से मिलती जुलती एक छोटी चिडिया जिसे ग्वालिन और अहीरिन भी कहते हैं । हारा = हाल, अथवा लाचारी, दीनता ।

(6) पैग पैग पर = कदम कदम पर । पाँवरी = सीढी । ब्रह्मचार = ब्रह्मचर्य । सुरसती = सरस्वती (दसनामियों में ) खेवरा = सेवडों का एक भेद ।

(7) भईं = घूमी हैं । गरेरी = चक्करदार । पाल = ऊँचा बाँध या किनारा, भीटा ।

(8) मेघावर = बादल की घटा । ता पाईं = पैर तक । बीजु - बिजली ।

(9) बानी = वर्ण, रंग, चमक । सोन,ढेक, बग, लेदी = ताल की चिडिया । मरजिया = जान जोखिम में डालकर विकट स्थानों से व्यापार की वस्तुएँ लानेवाले, जीवकिया, जैसे, गोता खोर ।

(10) हरफार््योरी = लवली । न्योजी = लीची । खँडवानी =काँड का रस ।

(11) कूजा = कुब्जक । पहाडी या जंगली गुलाब जिसके फूल सफेद होते हैं ।घनबेली =बेला की एक जाति । नागेसर = नागकेसर । बकौरी = बकावली । बगुचा = (गट्ठा) ढेर, राशि । सिंगार-हार = हरिसिंगार । शेफालिका ।

(12) मेद = मेदा एक सुगंधित जड । गौरा = गोरोचन । ओठँवि = पीठ टिकाकर ।

(13) कुहकुहँ = कुंकुम, केसर । धवल = सफेदी । सिरी = श्री, रोली, लाल बुकनी । बेना =खस वा गंधबेन । बेसाहनी = खरीद ।

(14) बेसा = वेश्या । खुंभी = कान में पहनने का एक गहना, लौंग या कील । सारी = सारि, पासा । गथ = पूँजी ।

(15) साँठ =पूँजी । नाठि = नष्ट हुई । सोंधा = सुगंध द्रव्य । गाँधी = गंधी । खिरौरी = केवडा देकर बाँधी हुई या कत्थे की टिकिया । चिरहँटा = बहेलिया । पखंडी = कठपुतलीवाला ।

(16) करिन्ह = दिग्गजों ।

(17) पाजी = पैदल सिपाही । कोतवार । कोटपाल, कोतवाल । गुंजरि लीहा = गरज कर लिया । (18) बसेरा = टिकान ।

(19) रहँट-घरी =रहट में लगा छोटा घडा । घरियार = घंटा । घरी भरी = घडी पूरी हुई (पुराने समय में समय जानने के लिये पानी भरी नाँद में एक घडिया या कटोरा महीन महीन छेद करके तैरा दिया जाता था । जब पानी भर जाने पर घडिया डूब जाती थी तब एक घडी का बीतना माना जाता था ।

(20) परस पखान = स्पर्शमणि, पारस पत्थर । सारी =पासा ।

(20) झारि = बिल्कुल या समूह । सरि पूज = बराबरी को पहुँचता है । खडगदान =तलवार चलाना ।

(21) बारा = द्वार । ठेघा = सहारा दिया । अँगवै = शरीर पर सहती है ।

(22) रजबार = राजद्वार । समंद = बादामी रंग का घोडा । हँसुल = कुम्मैत हिनाई, मेहँदी के रंग का और पैर कुछ काले । भौंर = मुश्की । कियाह = ताड के पके फल के रंग का । हरे = सब्जा । कुरंग = लाख के रंग का या नीला कुम्मेत । महुअ = महुए के रंग का गरर = लाल और सफेद मिले रोएँ का, गर्रा । कोकाह = सफेद रंग का । बुलाह = बुल्लाह, गर्दन और पूँछ के बाल पीले । ताजा - ताजियाना, चाबुक । अगमन = आगे । तुखार = तुषार देश के घोडे, यहाँ घोडे ।

(23) दर =दरवाजा । मेद =मेदा, एक प्रकार की सुगंधित जड । तवै = तपता है

(24) उरेह = चित्र । उबेहे =चुनेहुए, बीछे हुए । कोरिकै = खोद कर । बेहर बेहर = अलग अलग ।

(25) बारह-बानी = द्वादशवर्णी, सूर्य्य की तरह चमकनेवाली ।


No comments:

Post a Comment

निबंध | कवि और कविता | महावीर प्रसाद द्विवेदी | Nibandh | Kavi aur Kavita | Mahavir Prasad Dwivedi

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी निबंध - कवि और कविता यह बात सिद्ध समझी गई है कि कविता अभ्यास से नहीं आती। जिसमें कविता करने का स्वाभाविक माद्द...