Thursday, July 14, 2022

प्रबंध काव्य | पद्मावत (लक्ष्मी-समुद्र-खण्ड) | मलिक मोहम्मद जायसी | Prabandh Kavya | Padmavat / Laxmi Samudra Khand | Malik Muhammad Jayasi



 मुरछि परी पदमावति रानी । कहाँ जीउ, कहँ पीउ, न जानी ॥

जानहु चित्र-मूर्त्ति गहि लाई । पाटा परी बही तस जाई ॥

जनम न सहा पवन सुकुवाँरा । तेइ सो परी दुख-समुद अपारा ॥

लछिमी नाँव समुद कै बेटी । तेहि कहँ लच्छि होइ जहँ भेंटी ॥

खेलति अही सहेलिन्ह सेंती । पाटा जाइ लाग तेहि रेती ॥

कहेहि सहेली "देखहु पाटा । मूरति एक लागि बहि घाटा ॥

जौ देखा, तिवई है साँसा । फूल मुवा, पै मुई न बासा ॥


रंग जो राती प्रेम के ,जानहु बीर बहूटि ।

आइ बही दधि-समुद महँ, पै रंग गएउ न छूटि ॥1॥


लछिमी लखन बतीसौं लखी । कहेसि "न मरै, सँभारहु, सखी !॥

कागर पतरा ऐस सरीरा । पवन उडाइ परा मँझ नीरा ॥

लहरि झकोर उदधि-जल भीजा । तबहूँ रूप-रंग नहिं छीजा "

आपु सीस लेइ बैठी कोरै । पवन डोलावै सखि चहुँ ओरै ॥

बहुरि जो समुझि परा तन जीऊ । माँगेसि पानि बोलि कै पीऊ ॥

पानि पियाइ सखी मुख धोई । पदमिनि जनहुँ कवँल सँग कोईं ॥

तब लछिमी दुख पूछा ओही । तिरिया समुझि बात कछु मोहीं ॥


देखि रूप तोर आगर, लागि रहा चित मोर ।

केहि नगरी कै नागरी, काह नाँव धनि तोर ?" ॥2॥


नैन पसार देख धन चेती । देखै काह, समुद कै रेती ॥

आपन कोइ न देखेसि तहाँ । पूछेसि, तुम हौ को? हौं कहाँ ?॥

कहाँ सो सखी कँवल सँग कोई । सो नाहीं मोहिं कहाँ बिछोई ॥

कहाँ जगत महँ पीउ पियारा । जो सुमेरु, बिधि गरुअ सँवारा ॥

ताकर गरुई प्रीति अपारा । चढी हिये जनु चढा पहारा ॥

रहौं जो गरुइ प्रीति सौं झाँपी । कैसे जिऔं भार-दुख चाँपी? ॥

कँवल करी जिमि चूरी नाहाँ । दीन्ह बहाइ उदधि जल माहाँ ॥


आवा पवन बिछोह कर, पात परी बेकरार ।

तरिवर तजा जौ चूरि कै, लागौं केहि के डार ? ॥3॥


कहेन्हि" न जानहिं हम तोर पीऊ । हम तोहिं पाव रहा नहिं जीऊ ॥

पाट परी आई तुम बही । ऐस न जानहिं दुहुँ कहँ अही" ।

तब सुधि पदमावति मन भई । सवरि बिछोह मुरुछि मरि गई ॥

नैनहिं रकत-सुराही ढरै । जनहुँ रकत सिर काटे परै ॥

खन चेतै खन होइ बेकरारा । भा चंदन बंदन सब छारा ॥

बाउरि होइ परी पुनि पाटा । देहुँ बहाइ कंत जेहि घाटा ॥

को मोहिं आगि देइ रचि होरी । जियत न बिछुरै सारस-जोरी ॥


जेहि सिर परा बिछोहा, देहु ओहि सिर आगि ।

लोग कहैं यह सिर चढी, हौं सो जरौं पिउ लागि ॥4॥


काया-उदधि चितव पिउ पाँहा । देखौं रतन सो हिरदय माहाँ ॥

जनहुँ आहि दरपन मोर हीया । तेहि महँ दरस देखावै पीया ॥

नैन नियर, पहुँचत सुठि दूरी । अब तेहि लागि मरौं मैं झूरी ॥

पिउ हिरदय महँ भेंट न होई । को रे मिलाव, कहौं केहि रोई ?॥

साँस पास निति आवै जाई । सो न सँदेस कहै मोहिं आई ॥

नैन कौडिया होइ मँडराहीं । थिरकि मार पै आवै नाहीं ॥

मन भँवरा भा कँवल-बसेरी । होइ मरजिया न आनै हेरी ॥


साथी आथि निआथि जो सकै साथ निरबाहि ।

जौ जिउ जारे पिउ मिलै, भेंटु रे जिउ ! जरि जाहि ॥5॥


सती होइ कहँ सीस उघारा । घन महँ बीजु घाव जिमि मारा ॥

सेंदुर, जरै आगि जनु लाई । सिर कै आगि सँभारि न जाई ॥

छूटि माँग अस मोति-पिरोई । बारहिं बार जरै जौं रोई ॥

टूटहिं मोति बिछोह जो भरै । सावन-बूँद गिरहिं जनु झरे ॥

भहर भहर कै जोबन बरा । जानहुँ कनक अगिनि महँ परा ॥

अगिनि माँग, पै देइ न कोई । पाहुन पवन पानि सब कोई ॥

खीन लंक टूटी दुखभरी । बिनु रावन केहि बर होइ खरी ॥


रोवत पंखि बिमोहे जस कोकिल-अरंभ ।

जाकर कनक-लता सो बिछुरा पीतम खंभ ॥6॥


लछिमी लागि बुझावै जीऊ ।"ना मरु बहिन! मिलिहि तोर पीऊ ॥

पीउ पानि, होइ पवन -अधारी । जसि हौं तहूँ समुद कै बारी ॥

मैं तोहि लागि लेउँ खटवाटू । खोजहि पिता जहाँ लगि घाटू ॥

हौं जेहि मिलौं ताहि बड भागू । राजपाट औ देऊँ सोहागू "॥

कहि बुझाइ लेइ मंदिर सिधारी । भइ जेवनार न जेंवै बारी ॥

जेहि रे कंत कर होइ बिछोवा । कहँ तेहि भूख, कहाँ सुख-सोवा ?॥

कहाँ सुमेरु, कहाँ वह सेसा । को अस तेहि सौं कहै सँदेसा ?॥


लछिमी जाइ समुद पहँ रोइ बात यह चालि ।

कहा समुद "वह घट मोरे, आनि मिलावौं कालि" ॥7॥


राजा जाइ तहाँ बहि लागा । जहाँ न कोइ सँदेसी कागा ॥

तहाँ एक परबत अस डूँगा । जहँवाँ सब कपूर औ मूँगा ॥

तेहि चढि हेर कोइ नहिं साथा । दरब सैंति किछु लाग न हाथा ॥

अहा जो रावन लंक बसेरा । गा हेराइ, कोइ मिला न हेरा ॥

ढाढ मारि कै राजा रोवा । केइ चितउरगढ-राज बिछोवा ?॥

कहाँ मोर सब दरब भँडारा । कहाँ मोर सब कटक खँधारा ?॥

कहाँ तुरंगम बाँका बली । कहाँ मोर हस्ती सिंघली ? ॥


कहँ रानी पदमावति जीउ बसै जेहि पाहँ ।

'मोर मोर' कै खोएउँ, भूलि गरब अवगाह ॥8॥


भँवर केतकी गुरु जो मिलावै । माँगै राज बेगि सो पावै ॥

पदमिनि-चाह जहाँ सुनि पावौं । परौं आगि औ पानि धँसावौं ॥

खोजौं परबत मेरु पहारा । चढौं सरग औ परौं पतारा ॥

कहाँ सो गुरु पावौं उपदेसी । अगम पंथ जो कहै गवेसी ॥

परेउँ समुद्र माहँ अवगाहा । जहाँ न वार पार, नहि थाहा ॥

सीता-हरन राम संग्रामा । हनुवँत मिला त पाई रामा ॥

मोहिं न कोइ, बिनवौं केहि रोई । को बर बाँधि गवेसी होई ?॥


भँवर जो पावा कँवल कहँ, मन चीता बहु केलि ।

आइ परा कोइ हस्ती, चूर कीन्ह सो बेलि ॥9॥


काहि पुकारौं, का पहँ जाऊँ । गाढे मीत होइ एहि ठाऊँ ॥

को यह समुद मथै बल गाढै । को मथि रतन पदारथ काढै ? ॥

कहाँ सो बरह्मा, बिसुन महेसू । कहाँ सुमेरु, कहाँ वह सेसू? ॥

को अस साज देइ मोहिं आनी । बासुकि दाम, सुमेरु मथानी ॥

को दधि-समुद मथै जस मथा ? करनी सार न कहिए कथा ॥

जौ लहि मथै न कोइ देइ जीऊ । सूधी अँगुरि न निकसै घीऊ ॥

लेइ नग मोर समुद भा बटा । गाढ परै तौ लेइ परगटा ॥


लीलि रहा अब ढील होइ पेट पदारथ मेलि ।

को उजियार करै जग झाँपा चंद उघेलि ?॥10॥


ए गोसाइँ! तू सिरजन हारा । तुइँ सिरजा यह समुद अपारा ॥

तुइँ अस गगन अंतरिख थाँभा । जहाँ न टेक, न थूनि, न खाँभा ॥

तुइँ जल ऊपर धरती राखी । जगत भार लेइ भार न थाकी ॥

चाँद सुरुज औ नखतन्ह -पाँती । तोरे डर धावहिं दिन राती ॥

पानी पवन आगि औ माटी । सब के पीठ तोरि है साँटी ॥

सो मूरुख औ बाउर अंधा । तोहि छाँडि चित औरहि बंधा ॥

घट घट जगत तोरि है दीठी । हौं अंधा जेहि सूझ न पीठी ॥


पवन होइ भा पानी, पानि होइ भा आगि ।

आगि होइ भा माटी, गोरखधंधै लागि ॥11॥


तुइँ जिउ तन मेरवसि देइ आऊ । तुही बिछोवसि, करसि मेराऊ ॥

चौदह भुवन सो तोरे हाथा । जहँ लगि बिधुर आव एक साथा ॥

सब कर मरम भेद तोहि पाहाँ । रोवँ जमावसि टूटै जाहाँ ॥

जानसि सबै अवस्था मोरी । जस बिछुरी सारस कै जोरी ॥

एक मुए ररि मुवै जो दूजी । रहा न जाइ, आउ अब पूजी ॥

झूरत तपत बहुत दुख भरऊँ । कलपौं माँथ बेगि निस्तरऊँ ॥

मरौं सो लेइ पदमावति नाऊँ । तुइँ करतार करेसि एक ठाऊँ ॥


दुख सौं पीतम भेंटि कै, सुख सौं सोव न कोइ ।

एहि ठाँव मन डरपै, मिलि न बिछोहा होइ ॥12॥


कहि कै उठा समुद पहँ आवा । काढि कटार गीउ महँ लावा ॥

कहा समुद्र, पाप अब घटा । बाह्मन रूप आइ परगटा ॥

तिलक दुवादस मस्तक कीन्हे । हाथ कनक-बैसाखी लीन्हे ॥

मुद्रा स्रवन, जनेऊ काँधे । कनक-पत्र धोती तर बाँधे ॥

पाँवरि कनक जराऊँ पाऊँ । दीन्हि असीस आइ तेहि ठाऊँ ॥

कहसि कुँवर! मोसौं सत बाता । काहे लागि करसि अपघाता ॥

परिहँस मरस कि कौनिउ लाजा । आपन जीउ देसि केहि काजा ॥


जिनि कटार गर लावसि, समुझि देखु मन आप ।

सकति जीउ जौं काढै , महा दोष औ पाप ॥13॥


को तुम्ह उतर देइ, हो पाँडे । सो बीलै जाकर जिउ भाँडे ॥

जंबूदीप केर हौं राजा । सो मैं कीन्ह जो करत न छाजा ॥

सिंघलदीप राजघर-बारी । सो मैं जाइ बियाही नारी ॥

बहु बोहित दायज उन दीन्हा । नग अमोल निरमर भरि लीन्हा ॥

रतन पदारथ मानिक मोती । हुतीन काहु के संपति ओती ॥

बहल,घोड, हस्ती सिंघली । और सँग कुँवरि लाख दुइ चलीं ।

ते गोहने सिंघल पदमिनी । एक सो एक चाहि रुपमनी ॥


पदमावती जग रूपमति, कहँ लगि कहौं दुहेल ।

तेहिं समुद्र महँ खोएउँ, हौं का जिओ अकेल ?॥14॥


हँसा समुद, होइ उठा अँजोरा । जग बूडा सब कहि कहि 'मोरा ॥

तोर होइ तोहि परे न बेरा । बूझि बिचारि तहुँ केहि केरा ॥

हाथ मरोरि धुनै सिर झाँखी । पै तोहि हिये न अघरै आँखी ॥

बहुतै आइ रोइ सिर मारा । हाथ न रहा झूठ संसारा ॥

जो पै जगत होति फुर माया । सैंतत सिद्धि न पावत, राया ! ॥

सिद्धै दरब न सैंता गाडा । देखा भार चूमि कै छाडा ॥

पानी कै पानी महँ गई । तू जो जिया कुसल सब भई ॥


जा कर दीन्ह कया जिउ, लेइ चाह जब भाव ।

धन लछिमी सब थअकर, लेइ त का पछितावा ?॥15॥


अनु, पाँडे! पुरुषहि का हानी । जौ पावौं पदमावति रानी ॥

तपि कै पावा ,मिली कै फूला । पुनि तेहि खौइ सोइ पथ भूला ॥

पुरुष न आपनि नारि सराहा । मुए गए सँवरै पै चाहा ॥

कहँ अस नारी जगत उपराहीं ?। कहँ अस जीवन कै सुख-छाहीं ? ॥

कहँ अस रहस भोग अब करना । ऐसे जिए चाहि भल मरना ॥

जहँ अस परा समुद नग दीया । तहँ किमि जिया चहै मरजीया ? ॥

जस यह समुद दीन्ह दुख मोकाँ । देइ हत्या झगरौं सिवलोका ॥


का मैं ओहि क नसअवा, का सँवरा सो दाँव ?।

जाइ सरग पर होइहि एहि कर मोर नियाव ॥16॥


जौ तु मुवा, कित रोवसि खरा ? ना मुइ मरै, न रौवै मरा ॥

जो मरि भा औ छाँडेसि काया । बहुरि न करै मरन कै दाँया ॥

जो मरि भएउ न बूडै नीरा । बहा जाइ लागै पै तीरा ॥

तुही एक मैं बाउर भेंटा । जैस राम, दसरथ कर बेटा ॥

ओहू नारि कर परा बिछोवा । एहि समुद महँ फिरि फिरि रोवा ॥

उदधि आइ तेइ बंधन कीन्हा । इति दशमाथ अरमपद दीन्हा ॥

तोहि बल नाहिं-मूँदु अब आँखी । लावौ तीर, टेक बैसाखी ॥


बाउर अंध प्रेम कर सुनत लुबधि भा बाट ।

निमिष एक महँ लेइगा पदमावति जेहि घाट ॥17॥


पदमावति कहँ दुख तस बीता । जस असोक-बीरो तर सीता ॥

कनक लता दुइ नारँग फरी । तेहि के भार उठि होइ न खरी ॥

तेहि पर अलक भुअंगिनि डसा । सिर पर चढै हिये परगसा ॥

रही मृनाल टेकि दुख-दाधी । आधी कँवल भई, ससि आधी ॥

नलिन -खंड दुइ तस करिहाऊ । रोमावली बिछूक कहाऊँ ॥

रही टूटि जिमि कंचन-तागू । को पिउ मेरवै, देइ सोहागू ॥

पान न खाइ करै उपवासू । फुल सूख, तन रही न बासू ॥


गगन धरति जल बुडि गए, बूडत होइ निसाँस ।

पिउ पिउ चातक ज्यों ररै, मरै सेवाति पियास ॥18॥


लछिमी चंचल नारि परेवा । जेहि सत होइ छरै कै सेवा ॥

रतनसेन आवै जेहि घाटा । अगमन होइ बैठी तेहि बाटा ॥

औ भइ पदमावति कै रूपा । कीन्हेसि छाँह जरै जहँ धूपा ॥

देखि सो कँवल भँवर होइ धावा । साँस लीन्ह, वह बास न पाबा ॥

निरखत आइ लच्छमी दीठी । रतनसेन तब दीन्ही पीठी ॥

जौ भलि होति लच्छमी नारी । तजि महेस कत होत भिखारी ?॥

पुनि धनि फिरि आगे होइ रोई । पुरुष पीठि कस दीन्ह निछोई ?॥


हौं रानी पदमावति, रतनसेन तू पीउ ।

आनि समुद महँ छाँडेहु, अब रोवौं देइ जीउ ॥19॥


मैं हौं सोइ भँवर औ भोजू लेत फिरौं मालति कर खौजू ॥

मालति नारि, भँवर पीऊ । लहि वह बास रहै थिर जीऊ ॥

का तुइँ नारि बैठि अस रोई । फूल सोइ पै बास न सोई ॥

भँवर जो सब फूलन कर फेरा । बास न लेइ मालतिहि हेरा ॥

जहाँ पाव मालति कर बासू । वारै जीउ तहाँ होइ दासू ॥

कित वह बास पवन पहुँचावै । नव तन होइ, पेट जिउ आवै ॥

हौं ओहि बास जीउ बलि देऊँ । और फूल कै बास न लेऊँ ॥


भँवर मालतिहि पै चहै, काँट न आवै दीठि ।

सौंहैं भाल खाइ, पै फिरि कै देइ न पीठि ॥20॥


तब हँसि कह राजा ओहि ठाऊँ । जहाँ सो मालति लेइ चलु, जाऊँ ॥

लेइ सो आइ पदमावति पासा । पानि पियावा मरत पियासा ॥

पानी पिया कँवल जस तपा । निकसा सुरुज समुद महँ छपा ॥

मैं पावा पिउ समुद के घाटा । राजकुँवर मनि दिपै ललाटा ॥

दसन दिपै जस हीरा जोती । नैन-कचोर भरे जनु मोती ॥

भुजा लंक डर केहरि जीता । मूरत कान्ह देख गोपीता ॥

जस राजा नल दमनहि पूछा । तस बिनु प्रान पिंड है छूँछा ॥


जस तू पदिक पदारथ, तैस रतन तोहि जोग ।

मिला भँवर मालति कहँ, करहु दोउ मिलि भोग ॥21॥


पदिक पदारथ खीन जो होती । सुनतहि रतन चढी मुख जोती ॥

जानहुँ सूर कीन्ह परगासू । दिन बहुरा, भा कँवल-बिगासू ॥

कँवल जो बिहँसि सूर-मुख दरसा । सूरुज कँवल दिस्टि सौं परसा ॥

लोचन-कँवल सिरी-मुख सूरू । भएउ अनंद दुहूँ रस-मूरू ॥

मालति देखि भँवर गा भूली । भँवर देखि मालति बन फूली ॥

देखा दरस, भए एक पासा । वह ओहि के, वह ओहि के आसा ॥

कंचन दाहि दीन्हि जनु जीऊ । ऊवा सूर, छूटिगा सीऊ ॥


पायँ परी धनि पीउ के, नैनन्ह सों रज मेट ।

अचरज भएउ सबन्ह कहँ, भइ ससि कवलहिं भेंट ॥22॥


जिनि काहू कह होइ बिछोऊ । जस वै मिलै मिलै सब कोऊ ॥

पदमावति जौ पावा पीऊ । जनु मरजियहि परा तन जीऊ ॥

कै नेवछावरि तन मन वारी । पायन्ह परी घालि गिउ नारी ॥

नव अवतार दीन्ह बिधि आजू । रही छार भइ मानुष-साजू ॥

राजा रोव घालि गिउ पागा । पदमावति के पायन्ह लागा ॥

तन जिउ महँ बिधि दीन्ह बिछोऊ । अस न करै तौ चीन्ह न कोऊ ॥

सोई मारि छार कै मेटा । सोइ जियाइ करावै भेंटा ॥


मुहमद मीत जौ मन बसै, बिधि मिलाव ओहि आनि ।

संपति बिपति पुरुष कहँ, काह लाभ, का हानि ॥23॥


लछमी सौं पदमावति कहा । तुम्ह प्रसाद पायउँ जो चहा ॥

जौ सब खोइ जाहि हम दोऊ । जो देखै भल कहै न कोऊ ॥

जे सब कुँवर आए हम साथी । औ जत हस्ति, घोड औ आथी ॥

जौ पावैं, सुख जीवन भोगू । नाहिं त मरन भरन दुख रोगू ॥

तब लछमी गइ पिता के ठाऊँ । जो एहि कर सब बूड सो पाऊँ ॥

तब सो जरी अमृत लेइ आवा । जो मरे हुत तिन्ह छिरिकि जियावा ॥

एक एक कै दीन्ह सो आनी । भा सँतोष मन राजा रानी ॥


आइ मिले सब साथी, हिलि मिलि करहिं अनंद ।

भई प्राप्त सुख-संपति, गएउ छूटि दुख-द्वंद ॥24॥


और दीन्ह बहु रतन पखाना । सोन रूप तौ मनहिं न आना ॥

जे बहु मोल पदारथ नाऊँ । का तिन्ह बरनि कहौं तुम्ह ठाऊँ ॥

तिन्ह कर रूप भाव को कहै । एक एक नग चुनि चुनि कै गहे ॥

हीर-फार बहु-मोल जो अहे । तेइ सब नग चुनि चुनि कै गहे ॥

जौ एक रतन भँजावै कोई । करै सोइ जो मन महँ होई ॥

दरब-गरब मन गएउ भुलाई । हम सब लक्ष्छ मनहिं नहिं आई ॥

लघु दीरघ जो दरब बखाना । जो जेहि चहिय सोइ तेइ माना ॥


बड औ छोट दोउ सम, स्वामी -काज जो सोइ ।

जो चाहिय जेहि काज कहँ, ओहि काज सो होइ ॥25॥


दिन दस रहे तहाँ पहुनाई । पुनि भए बिदा समुद सौं जाई ॥

लछमी पसमावति सौं भेंटी । औ तेहि कहा `मोरि तू बेटी" ॥

दीन्ह समुद्र पान कर बीरा । भरि कै रतन पदारथ हीरा ॥

और पाँच नग दीन्ह बिसेखे । सरवन सुना, नैन नहिं देखे ॥

एक तौ अमृत, दूसर हंसू । औ तीसर पंखी कर बंसू ॥

चौथ दीन्ह सावक-सादूरू । पाँचवँ परस, जो कंचन-मूरू ॥

तरुन तुरंगम आनि चढाए । जल -मानुष अगुवा सँग लाए ॥


भेंट-घाँट कै समदि तब फिरे नाइकै माथ ।

जल-मानुष तबहीं फिरे जब आए जगनाथ ॥26॥


जगन्नाथ कहँ देखा आई । भोजन रींधा भात बिकाई ॥

राजै पदमावति सौं कहा । साँठि नाठि, किछु गाँठि न रहा ॥

साँठि होइ जेहि तेहि सब बोला । निसँठ जो पुरुष पात जिमि डोला ॥

साँठहि रंक चलै झौंराई । निसँठराव सब कह बौराई ॥

साँठिहि आव गरब तन फूला । निसँठहि बोल, बुद्धि बल भूला ॥

साँठिहि जागि नींद निसि जाई । निसँठहि काह होइ औंघाई ॥

साँठिहि दिस्टि, जोति होइ नैना । निसँठ होइ, मुख आव न बैना ॥


साँठिहि रहै साधि तन, निसँठहि आगरि भूख ।

बिनु गथ बिरिछ निपात जिमि ठाढ ठाढ पै सूख ॥ 27॥


पदमावति बोली सुनु राजा । जीउ गए धन कौने काजा ?॥

अहा दरब तब कीन्ह न गाँठी । पुनि कित मिलै लच्छि जौ नाठी ॥

मुकती साँठि गाँठि जो करै । साँकर परे सोइ उपकरै ॥

जेहि तन पंख, जाइ जहँ ताका । पैग पहार होइ जौ थाका ॥

लछमी दीन्ह रहा मोहिं बीरा । भरि कै रतन पदारथ हीरा ॥

काढि एक नग बेगि भँजावा । बहुरी लच्छि, फेरि दिन पावा ॥

दरब भरोस करै जिनि कोई । साँभर सोइ गाँठि जो होई ॥


जोरि कटक पुनि राजा घर कहँ कीन्ह पयान ।

दिवसहि भानु अलोप भा, बासुकि इंद्र सकान ॥28॥



(1) न जानी = न जानें । अही = थी । सेंती = से । रेती = बालू का किनारा । तीवइ = स्त्री में ।


(2) कागर = कागज । पतरा = पतला । उडाइ = उडकर । कौरै = गोद में । बोलि कै = पुकारकर । समुझि = सुध करके ।


(3) चेती = चेत करके, होश में आकर । देखै काह = देखती क्या है कि । झाँपी = आच्छादित । चाँपी = दबी हुई । चूरी = चूर्ण किया । लागौं केहहि के डार = किसकी डाल लगूँ अर्थात् किसका सहारा लूँ ?


(4) पाव = पाया । सँवरि = स्मरण करके । सर चिता ।


(5) थिरकि मार = थिरकता या चारों ओर नाचता है । साथी....निरबाहि = साथी वही है जो धन और दरिद्रता दोनों में साथ निभा सके । आथि = सार,पूँजी । निआथि = निर्धनता । घन महँ...मारा = काले बालों के बीच माँग ऐसी है जैसे बिजली की दरार । भहर भहर = जगमगाता हुआ । माँग = माँगती है । पाहुन पवन...सब कोई = मेहमान समझ कर सब पानी देती हैं और हवा करती हैं ।बर = बल,सहारा । अरंभ = रंभ, नाद, कूक ।


(7) बुझावै लागि = समझाने-बुझाने लगी । बारी = लडकी । लेउँ खटवाटू = खटपाटी लूँगी; रूसकर काम-धंधा छोड पडी रहूँगी (स्त्रियों का रूसकर खाना-पीना छोड खाट पर इसलिये पड रहना कि जब तक मेरी बात न मानी जायगी न उठूँगी, `खटपाटी' लेना कहलाता है ) सुख-सोवा = सुख से सोना (साधारण क्रिया का यह रूप बँगला से मिलता है ।) कहाँ सुमेरु...सेसा = आकाश पाताल का अंतर । बात चालि = बात चलाई ।


(8)डूँगा = टीला। खँधारा = स्कंधावार , डेरा, तंबू । अवगाह = अथाह (समुद्र) में ।


(9) चाह = खबर । दँसावौं = धँसूँ । गवेसी = खोजी, ढूँढँनेवाला, गवेषणा करनेवाला । बर वाँधि = रेखा खींचकर, दृढ प्रतिज्ञा करके ( आजकल `वरैया बाँधि' बोलते हैं)


(10) मीत होइ = जो मित्र हो । गाढे =संकट के समय में । दाम = रस्सी । करनी सार ..कथा = करनी मुख्य है, बात कहने से क्या है ? बटा भा = बटाऊ हुआ, चल दिया । ढील होइ रहा = चुपचाप बैठा रहा । उघेलि = खोलकर ।


(11) थाँबा = ठहराया, टिकाया । थूनि = लकडी का बल्ला जो टेक के लिये छप्पर के नीचे खडा किया जाता है । भार न थाकी = भार से नहीं थकी । सब के पीठि....साँटी = सब की पीठ पर तेरी छडी है, अर्थात् सब के ऊपर तेरा शासन है ।


(12) मेरवसि = तू मिलाता है । आउ = आयु । बिछोवसि = बिछोह करता है । मेराऊ = मिलाप । जाहाँ = जहाँ । कलपौं = काटूँ । करेसि = तुम करना ।


(13) पाप अब घटा = यह तो बडा पाप मेरे सिर घटा चाहता है । बैसाखी = लाठी । पाँवरि = खडाऊँ । पाऊँ = पाँव में । काहे लगि = किस लिये । अपघात = आत्मघात । परिहँस = ईर्ष्या ।


(14) तुम्ह = तुम्हें। भाँडे = घट में, शरीर में । ओती = उतनी चाहि । चाहि =बढकर । रूपमनी = रूपवती । दुहेल = दुख ।


(15) तोर...होइ...बेरा = तेरा होता तो तेरा बेडा तुझसे दूर न होता । झाँखी = झीखकर । उघरे = खुलती है । सैंतत सिद्धि...राया = तो हे राजा ! तुम द्रव्य संचित करते हुए सिद्धि पा न जाते । पानी कै...गई = जो वस्तुएँ (रत्न आदि) पानी की थीं वे पानी में गई । लेइ चाह = लिया ही चाहे । जब भाव = जब चाहे ।


(16) अनु = फिर, आगे । फूला = प्रफुल्ल हुआ । चाहि = अपेक्षा, बनिस्बत । मोकाँ = मोकहँ, मुझको । देइ हत्या = सिर पर हत्या चढाकर । दाँव = बदला लेने का मौका ।


(17) मरि भा = मर चुका । दायाँ = दाँव, आयोजन । बाट भा = रास्ता पकडा ।


(18) बीरौ = बिरवा, पेड । दाधी = जली हुई । करिहाउँ = कमर, कटि । बिछूक = बिच्छू । सेवाति =स्वाति नक्षत्र में ।


(19) छरै = छलती है । बाटा = मार्ग में । अगमन = आगे । दीठी = देखा । दीन्ही पीठी = पीठ दी, मुँह फेर लिया ।


(20) खोज = पता । कर फेरा = फेरा करता है । हेरा = ढूँढता है । वारै = निछावर करता है । नव = नया । भाल = भाला ।


(21) लेइ चलुँ, जाउँ = यदि ले चले तो जाऊँ । छपा = छिपा हुआ । कचोर = कटोरा । गोपीता = गोपी । दमनहि = दमयंती को । पिंड = शरीर । छूँछा = खाली । पदिक = गले में पहनने का एक चौखूँटा गहना जिसमें रत्न जडे जाते हैं ।


(22) पदिक पदारथ = अर्थात् पद्मावती । बहुरा = लौटा, फिरा । मूरू = मूल, जड । एक पासा = एक साथ । सीऊ = सीत । रज मेट = आँसुओं से पैर की भूल धोती है । भइ ससि कँवलहि भेंट = शशि, पद्मावती का मुख और कमल, राजा के चरण ।


(23) घालि गिउ = गरदन नीचे झुकाकर । मानुष साजू = मनुष्य-रूप में । घालि गिउ पागा = गले में दुपट्टा डालकर । पागा = पगडी । तन जिउ ...चीन्ह न कोऊ = शरीर और जीव के बीच ईश्वर ने वियोग दिया; यदि वह ऐसा न करे तो उसे कोई न पहचाने ।


(24) तुम्ह = तुम्हारे । आथी = पूँजी ,धन । जरी = जडी ।


(25) पखाना = नग, पत्थर । सोन = सोना । रूप = चाँदी तुम्ह ठाऊँ = तुम्हारे निकट, तुमसे । हीर-फार = हीरे के टुकडे । फार = फाल , कतरा, टुकडा । हम सम लच्छ = हमारे ऐसे लाखों हैं ।


(26) पहुनाई = मेहमानी । बिसेखे = विशेष प्रकार के । बंसू =वंश, कुल । सावक-सादूरू = शार्दूल-शावक, सिंह का बच्चा । परस = पारस पत्थर । कंचन-मूरू = सोने का मूल, अर्थात् सोना उत्पन्न करने वाला । जल-मानुष = समुद्र के मनुष्य । अगुवा = पथ-प्रदर्शक संग लाए = संग में लगा दिए । भेंट-घाट = भेंट-मिलाप । समदि =बिदा करके ।


(27) रींधा =पका हुआ । साँठि = पूँजी, धन । नाठि = नष्ट हुई । झौंराई = झूमकर । कह = कहते हैं । औंघाई = नींद । साधि तन = शरीर को संयत करके । आगरि = बढी हुई, अधिक । गथ = पूँजी ।


(28) नाठी = नष्ट हुई । मुकती = बहुत सी, अधिक । साँकर परे = संकट पडने पर । उपकरै = उपकार करती है, काम आती है । साँभर = संबल, राह का खर्च । सकान = डरा ।


No comments:

Post a Comment

निबंध | कवि और कविता | महावीर प्रसाद द्विवेदी | Nibandh | Kavi aur Kavita | Mahavir Prasad Dwivedi

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी निबंध - कवि और कविता यह बात सिद्ध समझी गई है कि कविता अभ्यास से नहीं आती। जिसमें कविता करने का स्वाभाविक माद्द...