Saturday, July 23, 2022

कहानी | ग्राम | जयशंकर प्रसाद | Kahani | Gram | Jaishankar Prasad


                                    1  
  
टन! टन! टन!—स्टेशन पर घंटी बोली। 


श्रावण-मास की संध्या भी कैसी मनोहारिणी होती है! मेघ-माला-विभूषित गगन की छाया सघन रसाल-कानन में पड़ रही है! अँधियारी धीरे-धीरे अपना अधिकार पूर्व-गगन में जमाती हुई सुशासनकारिणी महारानी के समान, विहंग प्रजागण को सुख-निकेतन में शयन करने की आज्ञा दे रही है। आकाशरूपी शासन-पत्र पर प्रकृति के हस्ताक्षर के समान बिजली की रेखा दिखाई पड़ती है...ग्राम्य स्टेशन पर कहीं एक-दो दीपालोक दिखाई पड़ता है। पवन हरे-हरे निकुंजों में से भ्रमण करता हुआ झिल्ली के झनकार के साथ भरी हुई झीलों में लहरों के साथ खेल रहा है। बूँदियाँ धीरे-धीरे गिर रही हैं, जो जूही कलियों को आर्द्र करके के पवन को भी शीतल कर रही हैं। 


थोड़े समय में वर्षा बंद हो गई। अँधकार-रूपी अंजन के अग्रभाग-स्थित आलोक के समान चतुर्दशी की लालिमा को लिए हुए चंद्रदेव प्राची में हरे-हरे तरुवरों की आड़ में से अपनी किरण-प्रभा दिखाने लगे। पवन की सनसनाहट के साथ रेलगाड़ी का शब्द सुनाई पड़ने लगा। सिग्नलर ने अपना कार्य किया। घंटे का शब्द उस हरे-भरे मैदान में गूँजने लगा। यात्री लोग अपनी गठरी बाँधते हुए स्टेशन पर पहुँचे। महादैत्य के लाल-लाल नेत्रों के समान अंजन-गिरिनिभ इंजिन का अग्रस्थित रक्त-आलोक दिखाई देने लगा। पागलों के समान बड़बड़ाती हुई अपनी धुन की पक्की रेलगाड़ी स्टेशन पहुँच गई। धड़ाधड़ यात्री लोग उतरने-चढ़ने लगे। एक स्त्री की ओर देखकर फाटक के बाहर खड़ी हुई दो औरतें—जो उसकी सहेली मालूम होती हैं—रो रही हैं, और वह स्त्री एक मनुष्य के साथ रेल में बैठने को उद्यत है। उनकी क्रंदन-ध्वनि से वह स्त्री दीन-भाव से उनकी ओर देखती हुई, बिना समझे हुए, सेकंड क्लास के दर्जे में चढ़ने लगी; पर उसमें बैठे हुए बाबू साहब- यह दूसरा दर्जा है, इसमें मत चढ़ो कहते हुए उतर पड़े और अपना हंटर घुमाते हुए स्टेशन से बाहर होने का उद्योग करने लगे। 


विलायती पिक का बिरजिस पहने, बूट चढ़ाए, हंटिंग कोट, धानी रंग का साफ़ा, अँग्रेज़ी हिन्दुस्तानी का महासम्मेलन बाबू साहब के अंग पर दिखाई पड़ रहा है। ग़ौर वर्ण, उन्नत ललाट—उसकी आभा को बढ़ा रहे हैं। स्टेशन मास्टर से सामना होते ही शेकहैंड करने के उपरांत बाबू साहब से बातचीत होने लगी। 


स्टेशन मास्टर- आप इस वक़्त कहाँ से आ रहे हैं? 


मोहनलाल- कारिंदों ने इलाक़ों में बड़ा गड़बड़ मचा रखा है, इसलिए मैं कुसुमपुर—जो कि हमारा इलाक़ा है—इंस्पेक्शन के लिए जा रहा हूँ।” 


फिर कब पलटिएगा? 


दो रोज़ में। 


अच्छा, गुड इवनिंग! 


स्टेशन मास्टर, जो लाइन-क्लियर दे चुके थे, गुड इवनिंग करते हुए अपने ऑफ़िस में घुस गए। 


बाबू मोहनलाल अँग्रेज़ी काठी से सजे हुए घोड़े पर, जो पूर्व ही स्टेशन पर खड़ा था, सवार होकर चलते हुए। 


                                      2 

सरलस्वभावा ग्रामवासिनी कुलकामिनीगण का सुमधुर संगीत धीरे-धीरे आम्र-कानन में से निकलकर चारों ओर गूँज रहा है। अँधकार गगन में जुगनू-तारे चमक-चमककर चित्त को चंचल कर रहे हैं। ग्रामीण लोग अपना हल कंधे पर रखे, बिरहा गाते हुए, बैलों की जोड़ी के साथ, घर की ओर प्रत्यावर्त्तन कर रहे हैं। 


एक विशाल तरुवर की शाखा में झूला पड़ा हुआ है, उस पर चार महिलाएँ बैठी हैं, और पचासों उसको घेरकर गाती हुई घूम रही हैं। झूले के पेंग के साथ 'अबकी सावन सइयाँ घर रहु रे' की सुरीली पचासों कोकिल-कंठ से निकली हुई तान पशुगणों को भी मोहित कर रही है। बालिकाएँ स्वछंद भाव से क्रीड़ा कर रही हैं। अकस्मात् अश्व के पद-शब्द ने उन सरला कामिनियों को चौंका दिया। वे सब देखती हैं, तो हमारे पूर्व-परिचित बाबू मोहनलाल घोड़े को रोककर उस पर से उतर रहे हैं। वे सब उनका भेष देखकर घबरा गईं और आपस में कुछ इंगित करके चुप रह गईं। 


बाबू मोहनलाल ने निस्तब्धता को भंग किया, और बोले, “भद्रे! यहाँ से कुसुमपुर कितनी दूर है? और किधर से जाना होगा? एक प्रौढ़ा ने सोचा कि 'भद्रे' कोई परिहास-शब्द तो नहीं है, पर वह कुछ कह न सकी, केवल एक ओर दिखाकर बोली, इहाँ से डेढ़ कोस तो बाय, इहै पैंड़वा जाई। 


बाबू मोहनलाल उसी पगडंडी से चले। चलते-चलते उन्हें भ्रम हो गया, और वह अपनी छावनी का पथ छोड़कर दूसरे मार्ग से जाने लगे। मेघ घिर आए, जल वेग से बरसने लगा, अँधकार और घना हो गया। भटकते-भटकते वह एक खेत के समीप पहुँचे; वहाँ उस हरे-भरे खेत में एक ऊँचा और बड़ा मचान था, जो कि फूस से छाया हुआ था, और समीप ही में एक छोटा-सा कच्चा मकान था। 


उस मचान पर बालक और बालिकाएँ बैठी हुई कोलाहल मचा रही थीं। जल में भीगते हुए भी मोहनलाल खेत के समीप खड़े होकर उनके आनंद-कलरव को श्रवण करने लगे। 


भ्रांत होने से उन्हें बहुत समय व्यतीत हो गया। रात्रि अधिक बीत गई। कहाँ ठहरें—इसी विचार में वह खड़े रहे, बूँदें कम हो गईं। इतने में एक बालिका अपने मलिन वसन के अँचल की आड़ में दीप लिए हुए उसी मचान की ओर जाती हुई दिखाई पड़ी। 


बालिका की अवस्था 15 वर्ष की है। आलोक से उसका अंग अँधकार-घन में विद्युल्लेखा की तरह चमक रहा था। यद्यपि दरिद्रता ने उसे मलिन कर रखा है, पर ईश्वरीय सुषमा उसके कोमल अंग पर अपना निवास किए हुए है। मोहनलाल ने घोड़ा बढ़ाकर उससे कुछ पूछना चाहा, पर संकुचित होकर ठिठक गए। परंतु पूछने के अतिरिक्त दूसरा उपाय ही नहीं था। मोहनलाल ने रूखेपन के साथ पूछा, कुसुमपुर का रास्ता किधर है? 


बालिका इस भव्य मूर्ति को देखकर डरी, पर साहस के साथ बोली, मैं नहीं जानती। ऐसे सरल नेत्र-संचालन से इंगित करके उसने ये शब्द कहे कि युवक को क्रोध के स्थान में हँसी आ गई और कहने लगा, तो जो जानता हो, मुझे बतलाओ, मैं उससे पूछ लूँगा। 


बालिका- “हमारी माता जानती होंगी। 


मोहन- इस समय तुम कहाँ जाती हो? 


बालिका- “(मचान की ओर दिखाकर) वहाँ जो कई लड़के हैं, उनमें से एक हमारा भाई है, उसी को खिलाने जाती हूँ। 


मोहन- बालक इतनी रात को खेत में क्यों बैठा है? 


बालिका- “वह रात-भर और लड़कों के साथ खेत ही में रहता है। 


मोहन- तुम्हारी माँ कहाँ है? 


बालिका- चलिए, मैं लिवा चलती हूँ। 


इतना कहकर बालिका अपने भाई के पास गई, और उसको खिलाकर तथा उसके पास बैठे हुए बालकों को भी कुछ देकर उसी क्षुद्र-कुटीराभिमुख गमन करने लगी। मोहनलाल उस सरला बालिका के पीछे चले। 


उस क्षुद्र कुटीर में पहुँचने पर एक स्त्री मोहनलाल को दिखाई पड़ी, जिसकी अंगप्रभा स्वर्ण-तुल्य थी, तेजोमय मुख-मंडल, तथा ईषत् उन्नत अधर अभिमान से भरे हुए थे, अवस्था उनकी पचास वर्ष से अधिक थी। मोहनलाल की आंतरिक अवस्था, जो ग्राम्य जीवन देखने से कुछ बदल चुकी थी, उस सरल गंभीर तेजोमय मूर्ति को देख और भी सरल विनययुक्त हो गई। उसने झुककर प्रणाम किया। स्त्री ने आशीर्वाद दिया और पूछा, “बेटा! कहाँ से आते हो? 


मोहन- मैं कुसुमपुर जाता था, किंतु रास्ता भूल गया...। 


'कुसुमपुर' का नाम सुनते ही स्त्री का मुख-मंडल आरक्तिम हो गया और उसके नेत्रों से दो बूँद आँसू निकल आए। अश्रु करुणा के नहीं, किंतु अभिमान के थे। 


मोहनलाल आश्चर्यान्वित होकर देख रहे थे। उन्होंने पूछा, आपको कुसुमपुर के नाम से क्षोभ क्यों हुआ? 


स्त्री- बेटा! उसकी बड़ी कथा है, तुम सुनकर क्या करोगे? 


मोहन- नहीं, मैं सुनना चाहता हूँ, यदि आप कृपा करके सुनावें। 


स्त्री- “अच्छा, कुछ जलपान कर लो, तब सुनाऊँगी। 


पुनः बालिका की ओर देखकर स्त्री ने कहा, कुछ जल पीने को ले आओ। आज्ञा पाते ही बालिका उस क्षुद्र गृह के एक मिट्टी के बर्तन में से कुछ वस्तु निकाल, उसे एक पात्र में घोलकर ले आई, और मोहनलाल के सामने रख दिया। मोहनलाल उस शर्बत को पान करके फूस की चटाई पर बैठकर स्त्री की कथा सुनने लगे। 


स्त्री कहने लगी, हमारे पति इस प्रांत के गण्य भूस्वामी थे, और वंश भी हम लोगों का बहुत उच्च था। जिस गाँव का अभी आपने नाम लिया है, वहीं हमारे पति की प्रधान ज़मींदारी थी। कार्यवश कुंदनलाल नामक एक महाजन से कुछ ऋण लिया गया। कुछ भी विचार न करने से उनका बहुत रुपया बढ़ गया, और जब ऐसी अवस्था पहुँची तो अनेक उपाय करके हमारे पति धन जुटाकर उनके पास ले गए, तब उस धूर्त ने कहा, “क्या हर्ज है बाबू साहब! आप आठ रोज़ में आना, हम रुपया ले लेंगे, और जो घाटा होगा, उसे छोड़ देंगे, आपका इलाक़ा फिर जाएगा, इस समय रेहननामा भी नहीं मिल रहा है। उसका विश्वास करके हमारे पति फिर बैठे रहे, और उससे कुछ भी न पूछा। उनकी उदारता के कारण वह संचित धन भी थोड़ा हो गया, और उधर उसने दावा करके इलाक़ा—जोकि वह ले लेना चाहता था—बहुत थोड़े रुपए में नीलाम करा लिया। फिर हमारे पति के हृदय में, उस इलाक़े के इस भाँति निकल जाने के कारण बहुत चोट पहुँची और इसी से उनकी मृत्यु हो गई । इस दशा के होने के उपरांत हम लोग इस दूसरे गाँव में आकर रहने लगे। यहाँ के ज़मींदार बहुत धर्मात्मा हैं, उन्होंने कुछ सामान्य 'कर' पर यह भूमि दी है, इसी से अब हमारी जीविका है।... 


इतना कहते-कहते स्त्री का गला अभिमान से भर आया और कुछ कह न सकी। 


स्त्री की कथा को सुनकर मोहनलाल को बड़ा दुःख हुआ। रात विशेष बीत चुकी थी, अत: रात्रि-यापन करके, प्रभात में मलिन तथा पश्चिमगामी चंद्र का अनुसरण करके, बताए हुए पथ से वह चले गए। 


पर उनके मुख पर विषाद तथा लज्जा ने अधिकार कर लिया था। कारण यह था कि स्त्री की ज़मींदारी हरण करने वाले, तथा उसके प्राणप्रिय पति से उसे विच्छेद कराकर इस भाँति दुःख देने वाले कुंदनलाल मोहनलाल के ही पिता थे। 


No comments:

Post a Comment

निबंध | कवि और कविता | महावीर प्रसाद द्विवेदी | Nibandh | Kavi aur Kavita | Mahavir Prasad Dwivedi

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी निबंध - कवि और कविता यह बात सिद्ध समझी गई है कि कविता अभ्यास से नहीं आती। जिसमें कविता करने का स्वाभाविक माद्द...