Tuesday, July 19, 2022

कबीर ग्रंथावली | पद (राग टोड़ी) | कबीरदास | Kabir Granthavali | Pad / Rag Todi | Kabirdas



 तू पाक परमानंदे।

पीर पैकबर पनहु तुम्हारी, मैं गरीब क्या गंदे॥टेक॥

तुम्ह दरिया सबही दिल भीतरि, परमानंद पियारे।

नैक नजरि हम ऊपरि नांहि, क्या कमिबखत हमारे॥

हिकमति करै हलाल बिचारै, आप कहांवै मोटे।

चाकरी चोर निवाले हाजिर, सांई सेती खोटे॥

दांइम दूवा करद बजावै, मैं क्या करूँ भिखारी।

कहै कबीर मैं बंदा तेरा, खालिक पनह तुम्हारी॥323॥


अब हम जगत गौंहन तैं भागे,

जग की देखि गति रांमहि ढूंरि लांगे॥टेक॥

अयांनपनै थैं बहु बौराने, समझि पर तब फिर पछिताने।

लोग कहौ जाकै जो मनि भावे, लहै भुवंगम कौन डसावै॥

कबीर बिचारि इहै डर डरिये, कहै का हो इहाँ रै मरिये॥324॥

No comments:

Post a Comment

निबंध | कवि और कविता | महावीर प्रसाद द्विवेदी | Nibandh | Kavi aur Kavita | Mahavir Prasad Dwivedi

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी निबंध - कवि और कविता यह बात सिद्ध समझी गई है कि कविता अभ्यास से नहीं आती। जिसमें कविता करने का स्वाभाविक माद्द...